हिमाचल में उत्तर प्रदेश का स्वाद

Tula Ram

65 वर्षीय तुला राम, मूल निवासी बरेली, बेहतर रोजगार के लिए हिमाचल आ पहुंचे |

By:- Suman Sharma

परदेसी बन्दे है दब के रहना पड़ता है बेटी सबकी सुननी पड़ती है यहा सब हमें अपने से अलग मानते है हम तो बस टाइम पास कर रहे है की किसी तरह परिवार को पाल ले बस और फिर अपना बुढ़ापा अच्छे से अपने शहर बरेली में बिताये” तुला राम |

65 वर्षीय तुला राम एक परदेसी जो की परिवार को पालने के लिए अपने शहर बरेली से यहाँ हिमाचल आये | इनकी उम्र 65 वर्ष है इस उम्र मे भी मेहनत करके अपने परिवार को पाल रहे है इसमें इनका साथ इनकी पत्नी और इनके दो छोटे बेटे दे रहे है |

इनके परिवार मे स्वयं तुला राम इनकी पत्नी इनके 3 बेटे एव 3 बेटियां है जिनमे से 1 बेटे की एव 2 बेटियों की शादी हो चुकी है | ये बर्गर बनाने का काम करते है इससे पहले ये बरेली में भी यही कार्य करते थे परन्तु वहा पर अच्छी कमाई नहीं हो होने के कारण इन्होने यहा आकर काम करने का निर्णय लिया |

इन्होने 1 रेहड़ी से अपने काम को शुरू किया था धीरे –धीरे इनका काम अच्छा चल पड़ा फिर इन्होने एक और रेहड़ी लगाना शुरू कर दिया | इसमें इनका साथ इनका बड़ा बेटा देता था परन्तु एक सड़क दुर्घटना मे उसकी मृत्यु हो गयी तब से इनके 2 छोटे बेटो ने इनका काम सम्भाल लिया |

 

मोदई (59) आलू छिलते हुए

मोदई (59), तुला राम की धर्मपत्नी, काम में हाथ बटाते हुए |

“हमे यह सब करने की आदत पड़ गई है अब अच्छा लगता है ये सारा काम करना शादी के कुछ टाइम बाद से ही हम अपने पति के साथ मिलकर ये काम कर रहे है अनपढ़ लोग है और कर भी क्या सकते है”

मोंदई एक गृहिणी जो घर के काम के साथ- साथ अपने पति तुला राम की मदद भी करती है बर्गर बनाने में इस्तेमाल होने वाले सामान को तैयार करने मे | यह सुबह 5 बजे उठ जाती है और अपने काम पर लग जाती है | ये सुबह उठकर आलू उबालते है उसके बाद चटनी तैयार करते है इस काम को ये दोनों पति पत्नी मिलकर पूरा करते है | इसके लिए इन्हें सुबह 5 बजे उठना पड़ता है | ये दोनों सारा सामान तैयार कर के अपने दोनों बेटो के पास दे देते है दोनों बेटे रेहड़ी लेकर चले जाते है |

 

घर की सफाई करते हुए कुसुम |

तुला राम की बड़ी बहु कुसुम घर की सफाई करती हुई |

“सुबह उठकर घर मे साफ़ – सफाई का काम करती हुई कुसुम का सारा दिन घर के कामो में बीत जाता है अपने लिए तो कोई समय ही नही मिलता पति के जाने के बाद तो बस अब अपने बच्चो की चिंता लगी रहती है”

तुला राम के बड़े बेटे निराल की पत्नी कुसुम, निराल की एक सड़क दुर्घटना मे मौत के बाद अपने सास ससुर देवर और 3 बच्चो के साथ रहती है | कुसुम को बरेली अपने घर मे रहना अच्छा लगता है यहा पर लोग बाहर के लोग है सोच कर अच्छे से बात नही करते | यहा का माहौल बहुत अच्छा है लोग बहुत अच्छे है फिर भी अपना शहर तो अपना होता है, वहां अपने सभी रिश्तेदार होते है उनसे जब दिल करे तब मिल सकते है | इनका कहना है की इनके पति की मृत्यु के बाद ये सिर्फ अपने बच्चो के लिए जी रही है | कुसुम कहती है की मेरी बेटी पढने मे बहुत होशियार है लेकिन हमारे यहा लड़कियों को नही पढ़ाया जाता, जल्दी शादी कर दी जाती है |

 

रवि काम पर जाने से पहले खाना खाते हुए |

बड़े बेटे की दुर्घटना में मौत के बाद रवि ने पिता के साथ हाथ बटाना शुरू कर दिया | रवि काम कर के पैसा कमाना चाहता है |

“पढाई करके कोई फायदा नही होता हमारे यहा लोग ऍम ए करके भी मजदूरी करते है किसी को नौकरी नही मिल पाती हम तो फिर भी कितना अच्छा काम करते है इसमें पढाई की कोई जरूरत नही”

रवि जो की शाहपुर मे बर्गर की रेहड़ी चलाते है | इनके अनुसार यह अपने काम से संतुष्ट है इनको पढाई करने मे कोई दिलचस्पी नही है इनकी 2 बहनों की शादी हो चुकी है 1 बहन की शादी करवाकर यह अपने पिता जी का बोझ हल्का करना चाहते है| इस काम से हमे अच्छी कमाई हो जाती है | हमारे यहा लड़कियों को बहुत दहेज़ देना पड़ता है इसीलिए दिन – रात एक करके कमा रहे है ताकि अपनी बहन की शादी करवा सके |

 

रवि ग्राहक को बर्गर देते हुए

रवि के लिए पढ़ाई ज़रूरी नहीं है | ग्राहक को सामान पैक करके देते हुए रवि

“ग्राहक का इंतज़ार करते हुए अच्छर, की कब कोई ग्राहक आये और कब उसकी कमाई हो ताकि शाम को घर जाकर वो अपने पिताजी के हाथो मे अपनी कमाई थमा सके”| 39 मील में हॉस्पिटल के बाहर बर्गर की रेहड़ी लगा कर बैठा तुला राम का छोटा बेटा अछर जिसने की आठवी तक की पढाई की फिर अपनी मर्जी से स्कूल जाना छोड़ दिया क्यूंकि पढाई करना बिलकुल अच्छा नही लगता |

“दीदी दाल रोटी मिल जाती है इसी काम से तो पढाई की क्या जरूरत है | यहा पर हमारा काम बहुत अच्छा चल रहा है पर 2 साल बाद हम अपने शहर वापिस चले जायेंगे वहा हमारे बहुत सारे दोस्त है सभी हमारी तरह भाषा बोलते है तो अपनापन लगता है यहा तो बस टाइम निकल रहा है मज़बूरी है कमाना तो पड़ेगा नही तो रोटी कहा से खायेंगे | अगर हमारी मजबूरी नही होती तो कभी भी अपना शहर छोड़ कर यहा नही आते |

“कड़ी धुप की परवाह ना करते हुए अपने काम को पूरी इमानदारी से कर रहे काम तो काम है“ और अगर खाना है तो कमाना तो पड़ेगा अगर हम धुप या छाँव की परवाह करेंगे तो कमाई नही कर पायेंगे”

 

बर्गर बनाते हुए रवि

शाहपुर में आकाश चाट भंडार काली मंदिर के सामने रवि रेहड़ी लगाते है जहां उनका अच्छा काम चलता है|

 

रवि शाहपुर में आकाश चाट भंडार काली मंदिर के सामने  रेहड़ी लगाते है, जहां उनका अच्छा काम चलता है | कभी – कभी बहुत भीड़ होती है दिन मे खाना खाने का टाइम भी नही लगता | लेकिन आजकल इतनी तेज धुप होती है पर फिर भी हमे यहा खड़े रह कर काम करना पड़ता है यह काम उतना आसान भी नही है जितना लोग समझते है फिर भी दिल को इतनी तसल्ली है की हम चोरी करके नही खाते मेहनत करके अपना पेट पालते है |

“बर्गर के लिए इस्तेमाल होने वाला सामान तैयार कर के देने के बाद अपने घर पर आराम करता हू | जब से बेटो ने काम सम्भाला है तब से मेरा काम आसान हो गया है मुझे आराम करने का समय मिल जाता है”

मेरे बेटे मेरा बहुत साथ दे रहे है मेहनत करते है आपके यहा तो बेटी की शादी करना आसान है लेकिन हमारे यहा लडकी को बहुत दहेज़ देना पड़ता है जिसके लिए एक के कमाने से कुछ नही होगा घर मे सब को काम करना पड़ता है लडकियों को पढ़ा लिखा कर कोई फायदा नही कल को तो उन्हें ससुराल ही जाना है पढाई पर पैसे खर्च करके कोई फायदा नही है | मुझे तो लडकियों का स्कूल जाना बिलकुल पसंद नही है | अपनी पोती को भी दसवी के बाद स्कूल नही जाने दूंगा उसकी भी जल्दी ही शादी करवा दूंगा |

 

[Text and Photographs are by Suman Sharma. She is a second-semester student at the Department of Journalism & Creative Writing, Central University of Himachal Pradesh.]

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One thought on “हिमाचल में उत्तर प्रदेश का स्वाद

  1. तस्वीरें बहुत अच्छी हैं | लेखन पर थोड़ी मेहनत की दरकार है | उम्मीद है लिखते लिखते इसमें भी सुधार आ जायेगा | शुभकामनाएँ

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