प्रवासी मजदूर की जिंदगी

चेहरें को बांधे हुए धर्मेन्द्र

“किसको यह काम करना अच्छा लगता है परन्तु क्या करे इस पापी पेट का सवाल जो है”!

By:- Diksha Sharma

धर्मेन्द्र हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले के छतरी गाँव ( शाहपुर )में दिहाड़ी मजदूरी करते है, बिहार के भीतिया के रहने वाले धर्मेन्द्र (२४)पिछले ५ महीने से छतरी में प्रवाशी मजदूर के रूप में काम कर रहे है .यहाँ वो सुबह 7 बजे से लेकर साम को 8 बजे तक काम करते है छतरी में वो सीमेंट सरिया का काम करते है इसके लिए उन्हें १०००० रुपए दिया जाता है जिसे वह अपने घर भेज देते है तथा अपनी दिनचर्या के लिए वो ट्रक से सीमेंट उतराने का काम करते है

एक प्रवाशी मजदूर

“ सीमेंट उतरने में साँस लेने में बड़ी दिक्कत होती है पर काम तो काम है ”धर्मेन्द्र एक छोटे से कमरे में बिहार के अपने 3 साथियों के साथ रहते है तथा वह अपना खाना खुद बनाते है ,इसके लिए उन्हें कोई रकम नहीं दी जाती.

सीमेंट की बोरियां  उतरता हुआ मजदूर

धर्मेन्द्र की शादी काफी कम उम्र में हो गए थी ,उन्हें एक लड़का और एक लड़की है .धर्मेन्द्र कुल तीन भाई है जिसमे से वो सबसे बड़े है “घर में सबसा बड़ा हूँ मैं, नहीं पढ़ पाया कमसे कम अपने दोनों भाईयों और बच्चो के तालीम में कोई कमी नहीं होने दूंगा”  धर्मेन्द्र घास फूस की झोपड़ी में रहते है क्यूंकि उन्हें सरकारी ‘आवास योजना’ का लाभ भी नही मिल पाया उन्होंने आवास योजना के लिए आवेदन किया था परन्तु ग्राम प्रधान की अनदेखी के चलते वो फॉर्म रद्द हो गया , “गरीबो की  कौन सुनता है” | धर्मेन्द्र  कहते है की उन्हें अपना घर बनबाना है इसलिए वो घर से इतनी दूर रहकर काम करते हैं “ यहाँ हमें पैसा ठीक मिल जाता है जिससे की हम अपने परिवार का पालन पोषण अच्छे से कर सके हम जो भी पैसा कमाते है वो सारा हम घर को  और खुद का गुजरा हमारा गाडियो से सीमेंट की बोरियां निकालने से हो जाता है हम सुबह 7 बजे से रात के 8 बजे तक काम करते है उसके बाद घर जाकर खाना बनाने का काम करते है”

बोरी को सर पे रखते हुआ एक प्रवाशी मजदूर

धर्मेन्द्र के दुसरे साथियों में विक्की कुराव् है वह बिहार के जिला भितिया से  है वह तीन भाई है  यह सबसे बड़े है उनका यह कहना है की इन्हें 3 साल हो गये घर से बाहर निकल कर इससे पहले यह पंजाब में काम करते थे घर से इतनी दूर हम काम करने इसलिए आते है क्योकि वहां पर खेती वाड़ी के सिवाय कुछ काम नही होता जिससे की “हम अपना घर अच्छे से चला सके ! हम जो यहाँ गाड़ियों से सामान उठाने का काम करते है उससे हमें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है इस काम से हमारे मुहं मैं धूल मिटटी चली जाती है जिससे आगे चल के हमें बहुत मुश्किल होगी परन्तु क्या करे इस पापी पेट का सवाल है की हमें काम करना पड़ता है जनवरी मैं हम बिहार वापिस जाकर गन्ने की कटाई करेंगे और फिर वापिस आकर इसी काम मैं लग जाएँगे”

आराम फरमाते हुए विक्की कुराव

विक्की ने कक्षा ५ तक ही पढाई की है वो १० साल से बाहर काम कर रहे है वो कुल १५००० से लेकर १६००० तक कमा लेते है जिसमे से वो ३००० घर को भेज देते है .

लारी के पास खड़ा एक मजदूर

तीसरे साथियों में राकेश है जो की बिहार के जिला बिद्याद्रिस्टी से है ! इनके घर मैं इनके माता पिता  पत्नी तथा इनके तीन बच्चे है इन्होने 6 क्लास तक पढाई की है इनका कहना है की “बिहार में एक आम इंसान को कमाने के लिये उतने रोजगार के साधन नही हिमाचल मैं आकर यह लोग इतना पैसा तो कमा लेते जिससे इनके  परिवार का खर्चा चल पड़ता है जब हम घर जाते है तो अपने बच्चो के लिये कपडे लेकर जाते है हम यह चाहते है की हमारे बच्चे पढ़ लिख कर आगे बड़े  उन्हें ऐसा काम न करना पडे ! साथ ही यहाँ का मौसम भी अनुकूल है” .राकेश १९९८ से प्रवासी मजदूर की जिंदगी बिता रहे है .

कपड़ो के धुलाई करते राकेश

यह केवल राकेश, विक्की और धर्मेन्द्र की कहानी नहीं है बल्कि कई ऐसे हजारो लोगो की कहानी है जो की प्रवाशी मजदूरों की जिंदगी बिता रहे है .

प्रवाशी मजदूर

[Diksha Sharma is a 2nd Semester student at the Department of Journalism & Creative Writing, Central University of Himachal Pradesh.]

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