किताबों और पेन की जगह औज़ार – रोजी – रोटी की अंतहीन यात्रा

जिंदगी की जलालत झेलते हुए,गरीबी से जूझते प्रवासी मजदूर

जिंदगी की जलालत झेलते हुए,गरीबी से जूझते प्रवासी मजदूर अपने गांव व शहर देहरादून से दूर हिमाचल प्रदेश में जिला काँगड़ा के एक छोटे से गांव भनोई में लोहे का कार्य करते

By:- Pooja Thakur

प्रवासी कर्मचारी दास नहीं हैं | वे भी इन्सान हैं |उन्हें भी दुनिया में सामान्य लोगों  की तरह ही गरिमा के साथ जीने का अधिकार है  | ऐसी एक कहानी है देहरादून के उन लोगों की जो अपने घर से बहुत दूर हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा ज़िले के भनोई गांव में रोजी रोटी की तलाश में आए हैं यहाँ तीन अलग –अलग  परिवार झुग्गी –झोंपड़ियों में रहते है | ये लोहे का काम करते हैं और दराट, कुल्हाड़ी ,दराटी इत्यादि बनाते हैं | ये परिवार 6 महीने पहले आये थे पूरी सर्दी ठंड में गुजारी | इनके पास न तो बिजली  हैं और न ही पानी की उचित व्यवस्था ! ये हिमाचल में कई सालों से काम कर रहे हैं परन्तु इनका कोई एक ठिकाना नहीं होता | ये काम की तलाश में अलग –अलग स्थानों पर जाते रहते हैं  |

, “हमारी भी मदद करो, गरीबों की लडकियों को कुछ मिल सके इनके पापा भी नहीं है”| शिला की चार बेटियाँ और 2 बेटे है | ये देहरादून की रहने वाली हैं इनका वहां काम उतना नहीं चल रहा था इसलिए इन्हें अपने गांव और घर से दूर आना पड़ा |

अगर रोटी कमानी है तो मेहनत करनी पड़ेगी उम्र का क्या वो तो बढ़ती ही रहती है , “हमारी भी मदद करो, गरीबों की लड़कियों को कुछ मिल सके इनके पापा भी नहीं है”| शिला की चार बेटियाँ और 2 बेटे है | ये देहरादून की रहने वाली हैं  इनका  वहां काम उतना नहीं चल रहा था इसलिए इन्हें अपने गांव और घर से दूर आना पड़ा |

जब तक सांस है जिंदगी तो चलेगी और जीने के लिए कमाना भी पड़ेगा | 15 साल पहले इनके पति की मृत्यु हो गयी थी | उस समय इनके बच्चे बहुत छोटे थे और इनकी उम्र भी बहुत छोटी थी | ऐसे में इनके लिए खुद को सम्भालना और बच्चों को सम्भालना बहुत मुश्किल था | पर फिर भी इन्होंने  हिम्मत नहीं हारी और अपने बच्चो को जैसे-तैसे पाल-पोस कर बड़ा किया | अब ये काम की खोज में जगह जगह घूमते रहते हैं ताकि एक अच्छी सी जगह मिल सके जहाँ इनका काम अच्छे से चल सके और जीवन का गुज़ारा हो सके|

लोहे को पिघलाकर आकार बदलने के लिए निरंतर पंखे के सहारे कोयले को जलाने की आस में अत्यधिक समय बिताती हैं संगीता
लोहे को पिघलाकर आकार बदलने के लिए निरंतर पंखे के सहारे कोयले को जलाने की आस में अत्यधिक समय बिताती हैं संगीता|

“दीदी हमारा तो काम ही यही है इसी से हमारी जिंदगी चलती है अगर हमने काम करना बंद कर दिया तो कौन हमें मुफ्त में रोटी देगा” | काम छोटा हो या बड़ा करना तो पड़ता ही है | बचपन से लेकर आजतक इन्होने यही काम किया है | इसी काम में इनका पूरा बचपन निकल गया | और यही नहीं लोहे के औजारों को पीठ में उठाकर दिनभर गांव में जाकर बेचना और शाम तक घर वापिस आना ! कई बार बिक्री हो जाती है तो कभी नहीं भी होती | ये कहती हैं  “अब तो ऐसे लगता है जैसे जिंदगी भी इसी काम में गुजर जाएगी” |

“ हमारा पढ़ने का बहुत मन करता था जब बचपन में दूसरों को स्कूल जाते हुए देखते थे तो हम सोचते हमें भी पड़ना हैं पर हमें  मौका ही नहीं मिला | बचपन से हमें सिर्फ काम करना ही सिखाया जाता है“ |

अजय अभी 17 साल का है जिस वक्त इन हाथों में अपने भविष्य के तकदीर को लिखने के लिए पेन और कॉपी होना चाहिए उस वक्त पिघले हुए लोहे को हथौड़े से आकार दिया जा रहा है,
जिस वक्त इन हाथों में अपने भविष्य के तकदीर को लिखने के लिए पेन और कॉपी होना चाहिए उस वक्त पिघले हुए लोहे को हथौड़े से आकार दिया जा रहा है, अजय अभी 17 साल का है|

इस छोटी सी उम्र में ही इसके सरे अरमान जैसे कि पढ़ लिखकर जिंदगी में एक मुकाम हासिल करने का अरमान गरीबी की भेंट चढ़ गए और इसका पूरा बचपन काम में ही निकल गया | खेलने कूदने की उम्र में घर से बहर कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह पर जाकर काम करना पड़ा | बचपन में जहाँ हाथ में पेन कॉपी होनी चाहिए थी वहां गरीबी और भूख ने हथौड़ा थमा दिया | हमारे देश में कई ऐसे गरीब लोग है जिनके सपने बचपन में ही कुचल  दिए जाते हैं | और वे कुछ नहीं कर पाते हैं इसका दोष उनके माँ बाप को भी नहीं दे सकते उनकी भी मजबूरी होती है जो उन्हें अपने बच्चों को स्कूल भेजने की जगह काम पर भेजना पड़ता है | शिला कहती है कि वह अपने बच्चों की पढाई का खर्चा करती या उनको दो वक्त की रोटी खिलाती |

बलवीर उम्र 48 साल हिमाचल प्रदेश में काँगड़ा जिला के भनोई गावं में लोहे का कार्य करते हुए

  बलवीर उम्र 48 साल हिमाचल प्रदेश में काँगड़ा जिला के भनोई गावं में लोहे का कार्य करते हुए   

चंदा की शादी बारह साल पहले हुई थी इनके चार बच्चे तीन लड़के और एक लड़की है | न घर है न रसोई आग जलाने के लिए लकड़ियाँ भी नहीं है फिर भी खाना तो बनाना है इसलिए पंखे और कोयले की सहायता से ही रोज इनका खाना बनता है |

चंदा की शादी बारह साल पहले हुई थी इनके चार बच्चे तीन लड़के और एक  लड़की है | न घर है न रसोई आग जलाने के लिए लकड़ियाँ भी नहीं है फिर भी खाना तो बनाना है इसलिए पंखे और कोयले की सहायता से ही रोज इनका खाना बनता है |

“पहले हमें 100 रूपये दो तब हम तुम्हें अपने बारे में बतायेंगे और क्या करोगे तुम जानकर ऐसे दिन में कई लोग आते है पर कोई हमारे लिए कुछ नहीं करता है”| बलवीर उम्र 48 साल देहरादून (सब्जी मंडी) के निवासी हैं | वह अपनी पत्नी ढालिया और 7 बच्चों के साथ काम की खोज में घर से निकले थे | हिमाचल में आकर अपने काम को ईमानदारी से कर रहे हैं | ये लोग अपने पूरे परिवार के साथ काम की तलाश में निकलते हैं और जहाँ इनको लगता है कि इस जगह पर काम ज्यादा चलेगा वहां पर ये अपना काम शुरू कर देते हैं | रास्ते में दर – दर की ठोकरें मिलने के बावजूद भी ये हिम्मत नहीं हारते | अपनी मंजिल को पाने की आस में लगातार चलते ही रहते हैं|

 

जिस उम्र में बच्चे खिलौने के साथ खेलते है उस उम्र में उन्हें काम करना पड़ रहा है | इनका काम ही इनका खेल है और ये लोहे के हथियार ही इनके खिलौने है |

जिस उम्र में बच्चे खिलौने के साथ खेलते है उस उम्र में उन्हें काम करना पड़ रहा है | इनका काम ही इनका खेल है और ये लोहे के हथियार ही इनके खिलौने है |

घर से दूर होने के बावजूद भी ये अपनी संस्कृति का पालन उसी श्रदा से करते है जैसे वो अपने घर पर किया करते थे | हर साल दिवाली पर मुर्गे की बली देते है ये उनकी परम्परा है |

 घर से दूर होने के बावजूद भी ये अपनी संस्कृति का पालन उसी श्रद्धा से करते है  जैसे वो अपने घर पर किया करते थे | हर साल दिवाली पर मुर्गे की बली देते है ये उनकी परम्परा है |      

 

[Text and Photographs are by Pooja Thakur. She is a second-semester student at the Department of Journalism & Creative Writing, Central University of Himachal Pradesh.]   

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