अब तो हिमाचल ही घर है

महेश ( 44 वर्ष )

By:- Raja Babu

अब तो हिमाचल ही घर है, साल में एक या दो बार ही छत्तीसगढ़ जाते है, महेश (44)  परिवार यही उनके साथ रहता है। बस घर के बुजुर्ग यहाँ नहीं रहते हैं। नारायणपुर के महेश अपनी बीबी और चार बच्चों के साथ हिमाचल के काँगड़ा जिले में रहते है। यहाँ पर वो एक प्रवासी मजदूर हैं। एक पेंट फैक्ट्री में महेश और उनका बड़ा बेटा जिसकी उम्र 17 साल है, काम करते है। परिवार की आय लगभग 14000 है।

महेश बताते हैं की वो छत्तीसगढ़ के जिस इलाके से है वहाँ एक तो काम नहीं मिलता और ऊपर से नक्सलवाद का प्रभाव भी बहुत ज़्यादा है। हिमाचल आने  का प्रमुख कारण जीविका तो है ही पर यहाँ की शान्ति भी एक अहम् वजह है।

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(Graphics Credit: Hindustan Times)

छत्तीसगढ़ का नारायणपुर इलाका नक्सल से बहुत प्रभावित हैं। देश के कई इलाको में आपको वहाँ के लोग मिल जाएंगे जो बताता है की प्रवासी होना उनकी मज़बूरी बन गयी हैं। रोटी कपडा मकान ही नहीं, कभी कभी हिंसा भी प्रवासी बना देती है। घर से दूर रहने पर मजबूर कर देती  है। छत्तीसगढ़ के हालात कुछ ऐसा ही बयाँ करते है। महेश के अनुसार यहाँ पर उन्हें आसानी से काम मिल गया है और हिंसा जैसी कोई समस्या भी नहीं हैं।

संतोष का घर

अपना घर ना होने की वजह से इन्हें कच्चे अस्थायी मकानों में रहना पढता है, जिसकी वजह से इनके पास शौचालय की सुविधा नहीं हैं। वैसे हिमाचल खुले में शौच मुक्त घोषित हो चूका है। पर हक़ीक़त में ऐसा है नहीं। महेश बताते हैं की प्रवासी होने की वजह से उन्हें सरकार की किसी भी योजना का फायदा नहीं मिल पाता है। महिलाओं को भी खुले में शौच जाना पड़ता है।

शान्ति देवी अपने ३ बच्चो के साथ

चार बच्चों में से तीन बच्चे यहाँ के स्थानीय सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं और बड़ा बेटा संतोष उनके साथ ही काम करता है।

संतोष (17 वर्ष )
संतोष एक पेंट फैक्ट्री में काम करता है | जिस उम्र में हाथो को किताबों का वजन उठाना चाहिए , उस उम्र में ये हाथे सीमेंट की बोरियां उठा रही हैं

सिर्फ 17 साल में मजदूरी करने लग जाना, बचपन के साथ धोका है। पर मज़बूरी इस धोके को खुद के साथ किया न्याय बताती है।
मेरा भी मन पढ़ाई का करता है, पर अब 3 साल हो गए पढ़ाई छोड़े। संतोष के इन शब्दों में उनका दर्द दिखाई देता है। पिछले 2 साल से संतोष और उनके पिता जी पेंट फैक्ट्री में काम कर रहे हैं। संतोष ने बताया की यहाँ पर उन्हें घर से ज़्यादा अच्छा लगता है, कम से कम खाना तो भरपेट मिलता है। रहने और कपड़े का भी इंतज़ाम हो जाता है। यहाँ पर हम सब खुश हैं, महेश और संतोष के इस वाक्य से उनकी संतुष्टि झलक रही थी।
ये हक़ीक़त थी एक प्रवासी मजदुर की। ये हक़ीक़त हर परिवार और जगह के हिसाब से बदलती रहती है।

[Text and Photographs are by Raja Babu. He is a second-semester student at the Department of Journalism & Creative Writing, Central University of Himachal Pradesh.

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